स्वामी विवेकानंद को अल्मोड़ा से था बेहद लगाव

अल्मोड़ा। स्वामी विवेकानंद को सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा (उत्तराखंड) से बेहद लगाव था। अपने जीवनकाल में उन्होंने तीन बार अल्मोड़ा की पैदल यात्रा की। यहां उन्होंने कई दिनों तक प्रवास किया और लोगों को अध्यात्म पर प्रवचन भी दिए। अल्मोड़ा प्रवास के दौरान स्वामी जी ने कई स्थानों पर कठिन तपस्या की।

स्वामी विवेकानंद 1890 में पहली बार अल्मोड़ा पहुंचे। यहां स्वामी शारदानंद और स्वामी कृपानंद से उनकी मुलाकात हुई। यहां वह लाला बद्री साह के घर पर रुके। एकांतवास की चाह में एक दिन वह घर से निकल पड़े और कसारदेवी पहाड़ी की गुफा में तपस्या में लीन हो गए। कुछ समय बिताने के बाद स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ यहां से बदरीनाथ की यात्रा पर निकल गए। 11 मई, 1897 में विवेकानंद दूसरी बार अल्मोड़ा पहुंचे। तब उन्होंने यहां खजांची बाजार में जनसभा को संबोधित किया। कहा जाता है कि तब यहां पांच हजार लोगों की भीड़ उनके दर्शनों के लिए एकत्र हुई थी।

स्वामी ने अपने भाषणों में कहा था- “यह हमारे पूर्वजों के स्वप्न का स्थान है। यह पवित्र स्थान है जहां भारत का प्रत्येक सच्चा धर्म पिपासु व्यक्ति अपने जीवन का अंतिम काल बिताने का इच्छुक रहता है। यह वही पवित्र भूमि है जहां निवास करने की कल्पना मैं अपने बाल्यकाल से ही कर रहा हूं।” उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि इन पहाड़ों के साथ हमारी श्रेष्ठतम स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। यदि धार्मिक भारत के इतिहास से हिमालय को निकाल दिया जाए तो उसका कुछ भी बचा नहीं रहेगा।

1897 में दूसरी बार अल्मोड़ा के भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद ने करीब तीन माह तक यहां निवास किया। वह 1898 में तीसरी बार अल्मोड़ा आए। इस बार उनके साथ स्वामी तुरियानंद व स्वामी निरंजनानंद के अलावा कई शिष्य भी थे। इस बार उन्होंने सेवियर दंपती का आतिथ्य स्वीकार किया। इस दौरान करीब एक माह की अवधि तक स्वामी जी अल्मोड़ा में प्रवास पर रहे।

स्वामी विवेकानंद के शिष्यों स्वामी तुरियानंद और स्वामी शिवानंद ने 1916 में अल्मोड़ा में ब्राइट एंड कार्नर पर आध्यात्मिक केंद्र की स्थापना कराई, जो आज रामकृष्ण कुटीर के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यहां से स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

 

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