पेटेंट का दावा खारिज…लेकिन यहां का बासमती गजब है

जबलपुर। बासमती पेटेंट के मामले में मध्य प्रदेश सरकार को भले ही झटका लगा है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के अपीलीय बोर्ड ने पेटेंट के दावे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेकिन इससे बासमती की रंगत को कोई फर्क नहीं पड़ता। बासमती अब भी हर दिल अजीज है। खाने-पीने का शौकीन हर सख्श इसकी खुशबू और जायके का दीवाना है। जबलपुर के साथ बालाघाट, सिवनी व इसके आसपास खेतों में जब बासमती की लहलहाती फसल पर फूल इतराते हैं तो उसकी सुगंध मुग्ध कर देती है।
हर कोई है मुरीद
सभी जानते हैं कि खाने की थाली में बासमती हर व्यक्ति की पहली पसंद है। अपने विशेष आकार और स्वाद के कारण यह प्रदेश से निकलकर विदेशों तक में भोजन की थाली में पहुंच गया है। कृषक केके अग्रवाल मानते हैं कि महाकोशल क्षेत्र में होने वाले बासमती चावल का लजीज स्वाद एक बार जिसकी जीभ पर चढ़ जाए तो वह उसका मुरीद हो जाता है। दरअसल, बालाघाट और इसके आसपास के क्षेत्र की मिट्टी और वातावरण बासमती के टेस्ट को दोगुना कर देता है। यही वजह है कि यहां का बासमती लोगों की पहली पसंद बन गया है।
उत्पादन का बड़ा रकबा
मध्य प्रदेश में बासमती चावल की पैदावार तकरीबन 17 लाख हेक्टेयर जमीन पर होती है। महाकोशल में बासमती चावल की पैदावार फिलहाल करीब सात लाख हेक्टेयर भूमि पर हो रही है। खेती का ये रकबा लगातार बढ़ रहा है। कृषि विशेषज्ञ डॉ. डीके पहलवान के अनुसार महाकोशल में औसतन 30-40 क्ंिवटल प्रति हैक्टेयर तक बासमती चावल की पैदावार हो रही है। सिंचाई सुविधा के बढऩे पर ये प्रति हेक्टेयर पैदावार और बढ़ सकती है। लेकिन यह बात भी सच है कि कम उत्पादन के कारण ही इस चावल का टेस्ट लजीज बना हुआ है।

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