यहां होती है क्रांतिकारी बिस्मिल की आरती, मंत्री झुकाते हैं सिर

मुरैना। सुबह के 6 बजे। हाइवे के किनारे स्थित एक मंदिर के पट खुले हुए हैं। मंदिर में पूजा की थाल तैयार है और भक्त भी आ चुके हैं। इसी बीच पुजारी ने मंदिर में प्रवेश किया। पूजा की थाली में रखे धूप व दीप प्रज्वलित करने के बाद पुजारी ने हाथ में गरुड़ घंटी उठाई और जयकारा लगाया- ‘बोलिए अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की…’। पीछे से भक्तों ने एक स्वर में जोर से कहा-‘जय’ और शंख-खड़ियाल की ध्वनि के बीच शुरू हुई अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की आरती।

यह नजारा शहीद क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के एकलौते मंदिर का है। यह मंदिर मुरैना शहर में हाइवे के किनारे जिला शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र परिसर में स्थित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि बिस्मिल का पैतृक गांव बरबाई है, जो मुरैना जिले में है।

पंडित रामप्रसाद के भक्तों ने मुरैना शहर में बिस्मिल के मंदिर का निर्माण करवाया है। बिस्मिल के भक्तों ने फरवरी 2009 में इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बिस्मिल के भक्त उनके जन्म दिवस व बलिदान दिवस पर शहर के इस मंदिर से लेकर पैतृक गांव बरबाई तक पदयात्रा भी करते हैं। इस बार भी 11 जून को बिस्मिल के भक्तों की प्रबोधन यात्रा मंदिर से शुरू होकर बरबाई तक जाएगी।

केंद्रीय मंत्री सहित कई बड़े लोग हैं भक्त

बिस्मिल के मंदिर में केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्य सरकार के कई मंत्री और कई बड़े लोग इस मंदिर में आकर माथा टेक चुके हैं और यहां आरती कर चुके हैं। शहीद पंडित रामप्रसाद के मंदिर में वर्तमान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, वर्तमान नेहरू युवा केंद्र उपध्यक्ष विष्णु शर्मा, पूर्व राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त भाजपा नेता अरुण तोमर से लेकर तात्याटोपे, मंगलपांडे जैसे क्रांतिकारियों के वंशज भी माथा टेक चुके हैं। शहर के कई बड़े अधिकारी भी यहां माथा टेकने आते हैं।

इस बार शहीद कलश ले जाएंगे अमृतसर

पंजाब सरकार द्वारा 18 जून को अमृतसर में भगत सिंह सोसाइटी द्वारा शहीद कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में मुरैना जिला प्रशासन शहीद कलश अमृतसर भिजवाने जा रहा है। डाइट कर्मचारी विशेंद्र पाल जादौन 11 जून को बरबाई से यह कलश लेकर अमृतसर रवाना होंगे। जबकि दूसरा शहीद कलश जेलर व्हीएस मौर्य मुरैना से तात्याटोपे की समाधि से होते हुए झांसी महारानी लक्ष्मीबाई के किले तक ले जाएंगे।

मुरैना से बिस्मिल का नाता

-रामप्रसाद बिस्मिल का पैतृक गांव बरबाई है। यहां से उनके दादा नारायण लाल पारिवारिक विवाद के चलते शाहजहांपुर चले गए थे।

-1918-19 में मैनपुरी षड़यंत्र के बाद दो साल तक बिस्मिल गेंदालाल दीक्षित के मार्गदर्शन में अपने पैतृक गांव में रहे और यहां उन्होंने अपनी फरारी काटी।

-मुरैना के बरबाई में रहते हुए 1920 में उन्होंने अंग्रेजी पुस्तक ग्रैंडमदर ऑफ रसियन रिवेल्युशन का हिंदी अनुवाद लिखा था।

-बिस्मिल का विवाह नहीं हुआ था, लेकिन उनके परिवार के वंशज बरबाई में आज भी निवास कर रहे हैं।

 

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