उम्मीद

कभी कभी ज्यादा उम्मीद भी ज़हर का काम करती है, आज भी हमारे भारत देश में हर रिश्ता एक दुसरे से काफी सारी उम्मीदें रखता है, चाहे वो माता पिता का अपनी संतान से हो या संतान का अपने माता पिता से हो, भाई का भाई से हो, बहन का भाई से हो, पति पत्नी की एक दुसरे से हो, सास ससुर का अपनी बहु से हो या बहु का अपने सास ससुर से हो, और भी बहोत सारे रिश्ते हैं जिनकी उमीदें तो बहोत रहतीं हैं, पर हर शख्स सारे रिश्तों की उमीदों पर खरा उतरे ये होना बेहद मुश्किल है और खासकर आज के समय में जब हर कोई अपनी अपनी जरूरतों और अपने सुख के लिए भाग रहा है, आज रिश्तों के बीच पैसा, अहम्, झूठे उसूलों ने जगह बना ली है, आज जितनी ज्यादा उम्मीद करेंगे उतनी ज्यादा तकलीफ होगी, तो इससे अच्छा है की एक सीमा तक ही किसी से उम्मीद की जाये ताकि सामने वाला भी रिश्ते निभाने में दिलचस्पी दिखाए और रिश्तों की उम्मीदों को अपने हिसाब से पूरा कर सके…

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