कन्यादान से बढ़कर है वरुथिनी एकादशी का फल

वरुथिनी एकादशी का व्रत करने वाले भगवान विष्णु को प्रिय होते हैं। इस व्रत का फल कन्यादान के फल से भी बढ़कर है।

इस एकादशी के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब करने में सक्षम नहीं है। इस भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करना चाहिए। इसके साथ ही यह वल्लाभाचार्य जयंती के तौर पर भी शुभ दिन है।

वैशाख कृष्ण एकादशी को ‘वरुथिनी एकादशी’ के नाम से जनमानस के बीच प्रतिष्ठा प्राप्त है। ‘वरुथिनी’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘वरुथिन’ से बना है, जिसका मतलब है- प्रतिरक्षक, कवच या रक्षा करने वाला।

चूंकि यह एकादशी व्रत भक्तों की हर कष्ट और संकट से रक्षा करता है, इसलिए इसे वरुथिनी ग्यारस या वरुथिनी एकादशी कहा जाता हैं।

सुख-सौभाग्य की आकांक्षा रखने वाले व्रती की मनोकामना इस व्रत के द्वारा पूर्ण होती है। व्रत करने वाले भगवान विष्णु को अतिप्रिय होते हैं और उन्हें हृदय कमल में जगह प्राप्त करने में सफल होते हैं। इस व्रत के प्रताप को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के सम्मुख बखान किया है। इस एकादशी पर सुपात्र ब्राह्मण को दान देने का बड़ा विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन किया गया दान कन्यादान के फल से बढ़कर फल देने वाला है।

पद्म पुराण में उल्लेख है कि भगवान श्रीकृष्ण इस व्रत से मिलने वाले पुण्य के बारे में युधिष्ठिर से कहते हैं, ‘पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब रख पाने में सक्षम नहीं हैं।’

इस दिन भक्तिभाव से भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। इस व्रत को करने वाले भगवान विष्णु की कृपा का भागीदार बनता है और उसके सम्पूर्ण क्लेशों का नाश होता है और जीवन में सुख शांति की प्राप्ति होती है।

इस एकादशी पर व्रती को चाहिए कि वह दशमी को अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व हविष्यान्ना का एक बार भोजन करे।

इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अत: इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत रहने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातून करना, परनिन्दा, क्रोध करना, झूठ बोलना वर्जित है। इस दिन निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए।

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