सुप्रीम कोर्ट का सवाल, दोषी व्यक्ति कैसे चला सकते हैं राजनीतिक पार्टी?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सवाल किया कि एक दोषी व्यक्ति किसी राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी कैसे हो सकता है और कैसे चुनावों के लिए प्रत्याशियों का चयन कर सकता है? यह तो चुनावों की शुचिता सुनिश्चित करने के उसके पूर्व के फैसलों की भावना के खिलाफ है।

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ अधिवक्ता और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, कानून का स्पष्ट सवाल है कि दोषी ठहराए जाने के बाद एक राजनेता की चुनावी राजनीति पर प्रतिबंध लग जाता है, लेकिन पार्टी का पदाधिकारी रहकर वह अपने एजेंटों के माध्यम से चुनाव लड़ सकता है। लिहाजा, जो आप व्यक्तिगत रूप से नहीं कर सकते, वह आप अपने एजेंटों के माध्यम से सामूहिक रूप से करते हो।

पीठ ने कहा कि अगर कोई दोषी व्यक्ति स्कूल खोलता है और जनसेवा के कुछ और कार्य करता है तो इसमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन मसला यह है कि क्या ऐसा व्यक्ति राजनीतिक दल का गठन करके अन्य लोगों के जरिये चुनाव लड़ सकता है? यह तो चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर कड़ा प्रहार है। केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने इस पर जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय मांगा, जिसे अदालत ने मंजूरी दे दी।

एक ही मतदाता सूची पर मांगा जवाब

संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को दो हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सार्वजनिक धन और जनशक्ति की बचत के लिए यह मांग की गई है। मामले पर अगली सुनवाई 5 मार्च को होगी।

चुनाव सुधारों पर अंतिम सुनवाई 19 मार्च को

दो सीटों से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने और निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतरने से हतोत्साहित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट 19 मार्च को अंतिम सुनवाई करेगा। अश्विनी उपाध्याय ने अपनी जनहित याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33(7) को अवैधानिक घोषित करने की मांग भी की है।

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