दक्षिण में बंद हुआ बीजेपी का द्वार, 2019 में कैसे आएगी मोदी सरकार?

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री पद के इस्तीफे के साथ ही दक्षिण में बीजेपी का द्वार एक बार फिर से बंद हो गया है. सूबे में कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर बीजेपी की सरकार गिराने में कामयाब रही. अब कांग्रेस-जेडीएस मिलकर सरकार बनाने जा रहे हैं.

कर्नाटक की सत्ता की कमान जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी के हाथों में होगी. कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम से विपक्ष की एकजुटता मजबूत होगी. अब देश में मोदी के खिलाफ विपक्ष एकजुट होकर महागठबंधन की शक्ल अख्तियार कर सकता है.

अगर ऐसा होता है, तो साल 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. सवाल ये भी हैं कि विपक्ष की एकजुटता का मुकाबला मोदी कैसे करेंगे और क्या देश में साल 2019 में फिर मोदी सरकार आएगी?

केंद्र में मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश काफी पहले से कर रही है, लेकिन वो अपने इरादे पर कामयाब नहीं हो पा रही थी. दूसरी तरफ देश में गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी गठबंधन बनाने की कोशिश हो रही है. ऐसे में कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी दल की ओर से जिस तरह कांग्रेस और जेडीएस के एक साथ आने की आवाज को बल मिला, उससे नई राजनीति की बिसात बिछती नजर आ रही है.

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस एक साथ आए हैं. अगर दोनों दल मिलकर साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उतरते हैं, तो फिर कर्नाटक में बीजेपी के लिए साल 2014 के चुनावी नतीजे को दोहराना मुश्किल हो जाएगा. विधानसभा चुनाव के नतीजों से तुलना करें, तो लोकसभा चुनाव में फिर राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से 22 सीटों पर कांग्रेस-जेडीएस का कब्जा होगा.

वहीं, बीजेपी महज छह सीटों पर सिमट जाएगी. इस तरह से बीजेपी को साल 2014 की तुलना में 11 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा सकता है. अगर कर्नाटक की तरह विपक्ष यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में एक साथ आते हैं, तो फिर बीजेपी के लिए सत्ता में वापसी करना मुश्किल हो सकता है.

यूपी में पहले से ही सपा-बसपा ने हाथ मिला रखा है. ऐसे में कांग्रेस भी साथ आती है, तो बीजेपी के लिए फिर मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. विपक्ष के साथ में आने से सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को ही होगा. क्षत्रपों को जहां अपने-अपने राज्यों में फायदा होगा, तो वहीं कांग्रेस को इनके सहारे दूसरे राज्यों की फसल काटने का मौका मिल जाएगा.

अगर साल 2014 के लोकसभा चुनाव का यूपी की सीटों पर विश्लेषण किया जाए और वोट प्रतिशत मिला दिए जाएं, तो सपा और बसपा को 80 सीटों में से 57 पर जीत मिलती यानी यदि सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़ते, तो बीजेपी को महज 23 सीटों पर ही संतोष करना पड़ता. हाल ही में गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनाव में यह बात साबित भी हो चुकी है. ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा का एक साथ आना तय है, जो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हो सकती है.

इसी तरह बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी विपक्षी एकजुटता बीजेपी के लिए अगले लोकसभा चुनाव में बड़ी चुनौती पेश करेगी. महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन से बीजेपी का कड़ा मुकाबला होगा. इसी तरह झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के बीच गठबंधन बीजेपी के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है.

इतना ही नहीं, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी बीजेपी के खिलाफ गठबंधन मोदी के दोबारा पीएम बनने की राह में रोड़ा पैदा कर सकता है. साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले इन राज्यों के क्षेत्रीय दल के बीच बढ़ती निकटता निश्चित रूप से महागठबंधन को मजबूत करती दिख रही है.

इसके अलावा तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुरजोर तरीके से बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन और विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही हैं. विपक्षी एकजुटता को देखते हुए इतना तो तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होगा. हालांकि यह बीजेपी के हित में नहीं दिख रहा है.

वर्तमान राजनीतिक माहौल पर गौर करें, तो आगामी लोकसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होगा. एकजुट विपक्ष पीएम मोदी को जोरशोर से घेरने की कोशिश करेगा. ऐसे में उनके सामने अपनी सत्ता को बचाए रखने की कड़ी चुनौती होगी. कर्नाटक में बीजेपी को आने से रोकने के लिए कांग्रेस का दांव इस बार सफल रहा है. उसने सिर्फ बीजेपी की सरकार ही नहीं गिराई, बल्कि उसका दक्षिण द्वार भी बंद कर दिया है.

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